चलो ना आज तो खत्म करते है जो भी शिकवे-गिले थे,
बड़ी मुश्किल से कटी थी, पिछली रात तुमसे खफा होकर…!!
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जिस जिस को मिली खबर सबने एक ही सवाल किया,
तुमने क्यों की मोहब्बत, तुम तो समझदार थे…!!
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गुनाह-ए-मोहब्बत की सज़ा भी क्या खूब मुकम्मल हुई,
जहाँ कैद चाही थी वहीं से रिहाई हुई…!!
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मैंने तो देखा था, बस एक नजर की खातिर,
क्या खबर थी की रग-रग में समां जाओगी तुम…!!
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मुझ से रूठकर वो खुश है तो शिकायत ही कैसी,
अब मैं उनको खुश भी ना देखूं तो हमारी मोहब्बत ही कैसी…!!

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